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Contents of this Issue |
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| 1) | Welcome Note from Editorial Board | Chief Editor |
| 2) | Subhaashitam - Good Word (सुभाषितम्) | सुभाषित रत्नभाण्डागारः |
| 3) | Vedic Wisdom ... 1 (वेदस्य अनित्यत्व- अपौरुषेयत्व शङ्कानिरासः) | A Chinmaya Datta Ghanapathi |
| 4) | Shaastra Vaakyam .. 1 | Dr Kuppa Narasimha Sharma |
| 5) | Upa Veda .. 1 आयुर्वेदः | अष्टाङ्ग हृदयम् |
| 6) | Upanishad ..1 (ईशावास्य उपनिषद् - हिन्दी) | Vid Arun Kumar Upadhyay |
| 7) | Need of Day ... 1 | Dr ABS Sastry |
| 8) | Kooshmaanda Sukta ... 1 | Vamshi Krishna Ghanapathi |
| 9) | Chitram ... 1 | |
| 10) | Shodasha Samskaara... 1 (షోడశ సంస్కారములు) | Dr వంశీకృష్ణ ఘనపాఠీ |
| 11) | Audio/Video of the Issue (Solutions to Societal Problems) | YouTube |
| 12) | Mangalam | Ramayana |
Dear Dharmik Readers
Have a Blessed day. Suvachanam intends to remind you of some good fodder for your thoughts. This journal would seek to ignite some thoughts. Provoke some churning. Cause a smile. Churn a debate internally. Share a good mood. This would be a good medium for us to spread positivity.
काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
Erudition and Scholastic engagement should be resort for intelligentsia, to spend the spare time. Let us engage further. The content would also be available at fb.com/suvachanam, where we can engage in a friendly banter too. Namo Mahadbhyah.
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पौरुषेयत्व प्रसङ्गः
अपौरुषेयाः वेदा इत्युक्तम्। किन्तु, तत्प्रत्याख्यानकल्पानि पौरुषेयत्वप्रसङ्गवन्ति बहूनि वाक्यानि वेदराशावेव वर्तन्ते।
अनित्यत्व प्रसङ्गः
अयं वेदराशिः अनादिरपि भवितुं नार्हति, अकर्तृकस्य वस्तुनः अदर्शन्नाल्लोके – इति अनित्यत्ववादिनामाक्षेपश्च अवतिष्ठते। एवञ्च, अनित्यत्वप्रपञ्चः श्रुतिमूलक एव, नास्माकं कपोलकल्पितः। यथा वर्तन्ते वाक्यानि,
यदुक्तं पुरुषात् ब्रह्मणो वा वेदः अजायत, तत एव पौरुषेय इति। ततः पुरुषकर्तृक दोषाः भवेयुः इति च। तदसत्।
अतः सुस्थं वेदनामपौरुषेयत्वं नित्यत्वञ्च। तन्मुखेन स्वतः प्रामाण्यञ्च निर्दुष्टम्।
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अष्टांगहृदय में आयुर्वेद के सम्पूर्ण विषय- कायचिकित्सा, शल्यचिकित्सा, शालाक्य आदि आठों अंगों का वर्णन है। उन्हों ने अपने ग्रन्थ के विषय में स्वयं ही कहा है कि, यह ग्रन्थ शरीर रूपी आयुर्वेद के हृदय समान है। जैसे- शरीर में हृदय की प्रधानता है, उसी प्रकार आयुर्वेद वाङ्मय में अष्टांगहृदय, हृदय के समान है।
प्रारम्भिक 4 श्लोक (मंगलम् - ग्रन्थविषय प्रतिज्ञा)
रागादिरोगान् सततानुषक्तान् अशेषकायप्रसृतानशेषान्।
औत्सुक्यमोहाऽरतिदान् जघान योऽपूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै॥ 1॥
(अन्वयः- सततानुषक्तान् अशेषकायप्रसृतान् औत्सुक्यमोहारतिदान् अशेषान् रागादिरोगान् यः जघान, तस्मै अपूर्ववैद्याय नमः अस्तु। )
आयुः कामयमानेन धर्मार्थसुखसाधनम्।
आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः॥ 2॥
(अन्वयः - धर्मार्थसुखसाधनम् आयुः कामयमानेन आयुर्वेदोपदेशेषु परमादरः विधेयः। )
ब्रह्मा स्मृत्वाऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत्।
सोऽश्विनौ तौ सहस्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकान्मुनीन्॥ 3॥
तेऽग्निवेशादिकांस्ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिरे।
(अन्वयः- ब्रह्मा आयुषः वेदं स्मृत्वा प्रजापतिम् अजिग्रहत्। सः अश्विनौ, तौ सहस्राक्षं, सः अत्रिपुत्रादिकान् मुनीन्, ते अग्निवेशादिकान्, ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिरे। )
तेभ्योऽतिविप्रकीर्णेभ्यः प्रायः सारतरोच्चयः॥ 4॥
क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसंक्षेपविस्तरम्।
(अन्वयः- अतिविप्रकीर्णेभ्यः तेभ्यः प्रायः सारतरोच्चयः न अतिसंक्षेपविस्तरम् अष्टाङ्गहृदयं क्रियते। )
भावार्थ- इधर-उधर (प्रकीर्ण) विक्षिप्त उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम से उत्तम (सार) भाग को लेकर यह संग्रह किया गया है। इस संग्रह ग्रंथ का नाम अष्टांगहृदय है। इसमें वर्णित विषय न अत्यन्त संक्षेप से और न अत्यन्त विस्तार से कहे गये हैं। )
संरचना
अष्टांगहृदय में 6 खण्ड, 120 अध्याय एवं कुल 7120 श्लोक हैं। अष्टांगहृदय के छः खण्डों के नाम निम्नलिखित हैं-
१) सूत्रस्थान (३० अध्याय)
२) शारीरस्थान (६ अध्याय)
३) निदानस्थान (१६ अध्याय)
४) चिकित्सास्थान (२२ अध्याय)
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